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VIRGINIA LIONATTO
hartford, CT
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 22
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Sheryl Cruz
Canton, OH
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 19
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Julie Veile
Bloomington, IL
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 17
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sara gaspar
lisbon, Portugal
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 17
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Lara Nunes
Pensacola, FL
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 17
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gwenn meltzer
ridley park, PA
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 16
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Brandy Dalton
Phoenix, AZ
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 15
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Joe Schriner Jr
Denver, CO
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 14
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Christina Jones
Wichita, KS
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 14
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Susanne Tyler
Kiel, Germany
- Sent letter to Smt. Pratibha Devisingh Patil (THE PRESIDENT OF INDIA)
- Jan 08
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No Nobel Prize / Bharet Ratna Award for Mahatma Gandhi : Why? - Sukanya Naresh Kadyan
Naresh Kadyan made a request to Her Excelency The President of India vide Registration number PRSEC/E/2009/09261 for consideration of Bharet Ratna award for Mahatma Gandhi Ji.
Mohandas Gandhi (1869-1948) has become the strongest symbol of non-violence in the 20th century. It is widely held – in retrospect – that the Indian national leader should have been the very man to be selected for the Nobel Peace Prize. He was nominated several times, but was never awarded the prize. Why?
These questions have been asked frequently: Was the horizon of the Norwegian Nobel Committee too narrow? Were the committee members unable to appreciate the struggle for freedom among non-European peoples?" Or were the Norwegian committee members perhaps afraid to make a prize award which might be detrimental to the relationship between their own country and Great Britain?
Gandhi was nominated in 1937, 1938, 1939, 1947 and, finally, a few days before he was murdered in January 1948. The omission has been publicly regretted by later members of the Nobel Committee; when the Dalai Lama was awarded the Peace Prize in 1989, the chairman of the committee said that this was "in part a tribute to the memory of Mahatma Gandhi". However, the committee has never commented on the speculations as to why Gandhi was not awarded the prize, and until recently the sources which might shed some light on the matter were unavailable.
Gandhian Ideologist and Philosopher Naresh Kadyan, animal rights activist comes forward to raise this issue with the consultation of former Chairman of the Khadi and Village Industries Commission (Govt. of India) Shri Laxmidas, Chairman, National Khadi and Village Industries Board's Employees Federation (An apex body of all State KVIB's Employees Unions). Please join these two groups :
* Nobel Prize for Mahatma Gandhi Group
Gandhi wrote a letter to Adolf Hitler concerning World War - 2
http://www.care2.com/news/member/582509077/1272897
http://www.care2.com/news/member/125240775/1272669
Industrialist Alfred Nobel Invented the Detonator for Dynamite and Nitroglycerin
http://nobelprize.org/nobel_prizes/
http://www.care2.com/news/member/576059368/1272564
Nobel Prize for Mahatma Gandhi
http://nobelprize.org/nobel_prizes/peace/articles/gandhi/index.html
http://www.care2.com/c2c/share/detail/1272555
गांधी जी के बहुत से प्रशंसकों को शांति का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह अभी-अभी मिला है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी यही बना हुआ है कि पांच बार नामांकित किए जाने के बावजूद यह पुरस्कार अहिंसा और शांति की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी को क्यों नहीं मिला ?
हालांकि तीन बार गांधी जी के नाम का चयन किया गया, लेकिन हर बार चयन समितियों ने अलग-अलग कारण बताकर उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिलने दिया। चयन समितियों ने गांधी जी को नोबेल न मिलने के कई कारण बताए जैसे कि 'वह अत्यधिक भारतीय राष्ट्रवादी थे' और वह 'बार-बार ईसा [शांति दूत] के रूप में सामने आते थे, लेकिन अचानक से साधारण राजनीतिज्ञ बन जाते थे। एक समिति का विचार था कि 'गांधी असल राजनीतिज्ञ या अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थक नहीं थे, न ही वह प्राथमिक तौर पर मानवीय सहायता कार्यकर्ता थे तथा न ही अंतरराष्ट्रीय शांति कांग्रेस के आयोजक थे।'
गांधी जी ने विश्व को यह दिखाया कि कि सत्याग्रह के जरिए कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए 1937, 1938, 1939, 1947 और अंत में जनवरी 1948 में शहादत से पहले नामांकित किया गया। नोबेल फाउंडेशन के अनुसार गांधी को 1937 में जब पहली बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया तो चयन समिति के सलाहकार प्रोफेसर जैकब वोर्म मुलर ने उनके बारे में आलोचनात्मक टिप्पणी की। जैकब ने अपनी टिप्पणी में कहा कि नि:संदेह वह [गांधी] अच्छे, आदर्श और तपस्वी व्यक्ति हैं। एक ऐसे व्यक्ति हैं जो सम्मान के योग्य हैं और लोग जिन्हें प्यार करते हैं, लेकिन उनकी नीतियों में कुछ ऐसे मोड़ हैं जिनकी उनके अनुयायी भी मुश्किल से संतोषजनक व्याख्या कर पाते हैं। वह एक स्वतंत्रता सेनानी और एक तानाशाह हैं, एक आदर्शवादी और राष्ट्रवादी। वह बारबार शांति दूत के रूप में उभरकर सामने आते हैं, लेकिन अचानक से एक साधारण राजनीतिज्ञ बन जाते हैं।
वोर्म मुलर ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि गांधी जी 'सुसंगत रूप से शांतिवादी' नहीं थे और उन्हें यह पता रहा होगा कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके कुछ अहिंसक आंदोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे। उन्होंने यह टिप्पणी 1920-1921 में गांधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के संदर्भ में की जब भीड़ ने चौरीचौरा में एक पुलिस थाने को जला दिया था और कई पुलिसकर्मियों को मार दिया तब दी थी। मुलर ने चयन समिति को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गांधी अत्यधिक भारतीय राष्ट्रवादी थे। उनके बारे में कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका में उनका संघर्ष सिर्फ भारतीयों की ओर से था, न कि उन अश्वेतों की ओर से जिनकी हालत अत्यंत दयनीय थी। गांधी जी को नोबेल के लिए 1938 और 1939 में भी नामांकित किया गया, लेकिन दूसरी बार उनके नाम का चयन भारत के आजाद होने के बाद 1947 में किया गया।
स्वतंत्रता सेनानी गोविन्द वल्लभ पंत बीजी खेर उन व्यक्तियों में शामिल थे जिन्होंने उन्हें नामांकित किया। उस समय नोबेल समिति के तत्कालीन सलाहकार जेन्स अरुप सीप की रिपोर्ट हालांकि उतनी आलोचनात्मक नहीं थी जितनी कि वोर्म मुलर की थी। हालांकि उस समय समिति के अध्यक्ष गुनर जान ने अपनी डायरी में लिखा कि यह बात सच है कि नामांकित व्यक्तियों में गांधी सबसे बड़ी हस्ती हैं। उनके बारे में बहुत सी अच्छी चीजें कही जा सकती हैं, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि गांधी सिर्फ शांति तपस्वी ही नहीं, वरन सर्वप्रथम और अग्रिम मोर्चे पर वह एक देशभक्त हैं।
जान ने कहा कि इसके अतिरिक्त हमें यह बात भी दिमाग में रखनी चाहिए कि गांधी भोले-भाले नहीं हैं। वह एक दक्ष न्यायविद और वकील हैं। गांधी जी को 11 साल में तीसरी बार 1948 में चयनित किया गया, लेकिन इसी वर्ष जनवरी में उनकी हत्या हो गई। इस घटना के चलते नोबेल समिति इस माथापच्ची में लग गई कि उन्हें मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार दिया जाए या नहीं।
गांधी जी को 1948 में यह पुरस्कार इसलिए नहीं मिल पाया। क्योंकि नोबेल समिति ने यह कहकर इस साल किसी को भी पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया कि इसके लिए कोई 'योग्य जीवित उम्मीदवार' नहीं है। समिति के सलाहकार सीप ने गांधी जी के जीवन के अंतिम पांच महीनों में उनकी गतिविधियों पर एक रिपोर्ट लिखी। उन्होंने लिखा कि गांधी ने जीवनभर आदर्शो के जरिए अपने काम और राजनीति में जिस तरह की अमिट छाप छोड़ी, वह देश और देश के बाहर बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा के रूप में काम करती रहेगी।
इस संदर्भ में गांधी की तुलना सिर्फ धर्म संस्थापकों से की जा सकती है। समिति ने किसी को मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार देने की संभावना की तलाश की, लेकिन वह खुद संदेहों से घिरी थी। उस समय नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार विशेष परिस्थितियों में किसी को मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता था, इसलिए गांधी जी को यह पुरस्कार दिया जाना संभव था, लेकिन गांधी किसी संगठन से संबंधित नहीं थे।
रिपोर्ट में लिखा गया कि गांधी ने कोई संपत्ति और वसीयत नहीं छोड़ी। उनके मरणोपरांत पुरस्कार राशि किसे दी जाए, इस बारे में पुरस्कार प्रदाता स्वीडिश संस्थानों ने चर्चा की, लेकिन उत्तर नकारात्मक रहा। उन्होंने सोचा कि मरणोपरांत पुरस्कार तभी दिया जा सकता है जब विजेता का निधन समिति के फैसले के बाद हो। गांधी को नोबेल की ज़रूरत नहीं। नोबेल को गांधी की है। नोबेल कौन होता है, गांधी की महानता तय करने वाला बड़ी बात ये है कि क्या नोबेल को गांधी सम्मान मिलता है या नहीं
नरेश कादियान, अध्यक्ष - पीपल्स फॉर एनिमल हरियाणा
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अंतरराष्ट्रीय पशु रक्षा संगठन के भारतीय प्रतिनिधि
Naresh Kadyan http://nareshkadyan.webs.com/
Representative of the International Organization for Animal Protection in India,
http://www.oipa.org/oipa/news/oipaindia.html
Chairman, PFA Haryana http://www.pfaharyana.in
+91-9813010595 , +91-9313312099
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मोहनदास कर्मचंद गांधी और एलफ्रेड नोबेल दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन एक विवाद में दोनों का नाम शामिल है। विवाद इस बात पर है कि क्या गांधी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए? गांधी शांति और अहिंसा के दूत माने जाते हैं। उनके जन्म दिवस दो अक्टूबर को अब विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब-तब गांधी को अपना आदर्श बताते रहते हैं। ये सभी बातें गांधी की महान शख़्सियत पर मुहर लगाती हैं। लेकिन गांधी की उपलब्धि में लोग एक कमी देखते हैं। गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। उन्हें नोबेल पुरस्कारों के लिए पांच बार नामित किया गया, लेकिन अलग-अलग वजहों से उन्हें पुरस्कार के क़ाबिल नहीं माना गया। अब नोबेल फाउंडेशन भी अपनी ग़लती को मानता है कि गांधी को नोबेल न देना एक भूल थी। कुछ गांधी समर्थकों की मांग है कि कम से कम अब गांधी को नोबेल पुरस्कार देकर फाउंडेशन भूल-सुधार कर ले। सवाल उठता है कि क्या वाकई गांधी को नोबेल पुरस्कार की ज़रूरत है? क्या नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद गांधी की महानता में एकाध स्टार और बढ़ जाएंगे। दरअसल गांधी जितने महान थे, वो उतने ही रहेंगे। उसमें किसी तरह की कमी इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि अब वो जीवित नहीं हैं। रही बात उनकी महानता को सम्मान देने की, तो अगर उन्हें नोबेल मिल जाए तो अच्छा ही है, और अगर न मिले तो भी कोई बुराई नहीं है। अक्सर हम भारतीय नोबेल, ऑस्कर और बुकर जैसे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों या सम्मानों को बेवजह ज़्यादा तूल दे देते हैं। हम भूल जाते हैं कि विदेशों में लोग इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं करते कि उनके किसी नागरिक को गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मान मिला या नहीं। तो फिर हम उस शख़्स के नाम पर मिलने वाले पुरस्कार की चिंता क्यों करे जिसने दुनिया को डायनामाइट जैसी विध्वंशक चीज़ दी। दरअसल कुछ लोग नोबेल पुरस्कार को किसी शख़्स की महानता का पैमाना मानते हैं, जो मेरे विचार से सही नहीं। अगर ऐसा होता तो गांधी को अपना आदर्श मानने वाले ओबामा गांधी से बड़े शांति दूत होते क्योंकि ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। जिस तरह हर साल चुनी जाने वाली मिस वर्ल्ड दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत महिला नहीं कही जा सकती। ऑस्कर जीतने वाले से बड़ा कलाकार दुनिया में नहीं है, ये नहीं कहा जा सकता, नोबेल भी किसी की महानता को तय करने का सही और अंतिम पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।
-विनोद अग्रहरि
Dear Kadyan Sahib,
I have shown all your emails to Mrs Tara Gandhi Bhttacharjee -http://www.taragandhi.com/profile.asp. Her reply is as follows [To talk about peace prize for Gandhi is like showing a candle to the sun. I think instead of struggling for peace prize for Gandhi, it will be best if we find peace in our own consciousness. Achieving peace and reaching universal harmony need a conscious and constant movement."]
Bujha Singh, PS to Tara Gandhi, Vice Chairperson to Gandhi Smriti and Darshan Samiti, Gandhi Darshan, New Delhi-110002.
http://gandhismriti.gov.in/indexb.asp
Petition Text
No Nobel Prize / Bharet Ratna Award for Mahatma Gandhi : Why? - Sukanya Naresh Kadyan
Her Excelency The President of India,
[Your name]
